राजनीति में भाषा का क्षय? ‘हमें राजनीति में अपनी बंगाली चाहिए’ विषय पर संगोष्ठी आयोजित

क्या राजनीति में बंगाली भाषा का स्थान कमजोर होता जा रहा है? इसी अहम प्रश्न को केंद्र में रखकर सरस्वती भंडार, भाषा कर्मी झरना भट्टाचार्य द्वारा स्थापित संस्था, ने 28 दिसंबर को कोलकाता के एम.पी. बिड़ला प्लैनेटेरियम के सेमिनार हॉल में एक विचारोत्तेजक पैनल चर्चा का आयोजन किया। कार्यक्रम का मूल संदेश था— “हम बंगाल में अपनी बंगाली चाहते हैं।”

इस संगोष्ठी को एडवोकेट सौरव साहा चौधुरी, (लीगल अफेयर्स, लायंस क्लब ऑफ कोलकाता मैग्नेट्स) और रोटरी क्लब ऑफ कसबा का सक्रिय समर्थन प्राप्त हुआ। कार्यक्रम के इवेंट पार्टनर के रूप में NIDHI ASSOCIATES (आबिरलाल विश्वास के नेतृत्व में) तथा Red Check Risk Management Pvt. Ltd., भुवनेश्वर, ओडिशा (सीईओ व संस्थापक मनीष खान के नेतृत्व में) ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

चर्चा का मुख्य विषय यह रहा कि भाषा किस प्रकार शरीर, मन, परिवार, समाज, राजनीति और आने वाली पीढ़ियों को प्रभावित करती है तथा समय के साथ इन प्रभावों का विकास कैसे होता है। इस अवसर पर देश-विदेश से आए प्रतिष्ठित वक्ताओं और अतिथियों ने अपने विचार साझा किए। प्रमुख वक्ताओं में अमेरिका से आईं आध्यात्मिक प्रचारक आनंदिनी राधिका, पत्रकार एवं फिल्म निर्माता ऋत्वब्रत भट्टाचार्य, लेखक सैयद हसमत जलाल, कर्नाटक के कवि, चिंतक व कृषि विशेषज्ञ नागथिहल्ली रमेश, सांस्कृतिक आयोजक श्यामल विश्वास, राजनीतिक विश्लेषक प्रीतम दत्त, ध्रुपद गायक सुदीप पाल तथा समाजसेवी शुभजीत दत्तगुप्ता शामिल थे।

इसके साथ ही लायंस क्लब ऑफ कोलकाता मैग्नेट्स और रोटरी क्लब ऑफ कसबा के सम्मानित सदस्यों— संगीता दास, सीमा सिंह और बासु देव अग्रवाल—ने भी अपने विचार रखे। कार्यक्रम का संचालन सामाजिक प्रभावशाली एवं ‘हेलो कोलकाता’ के संपादक-प्रबंध निदेशक आशीष बसाक ने किया।

कार्यक्रम में वक्ताओं ने इस बात पर चिंता जताई कि वर्तमान समय में राजनीति और सार्वजनिक जीवन में भाषा की मर्यादा लगातार गिर रही है। वक्ताओं ने कहा कि बंगाली भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि हमारी पहचान, चेतना और सांस्कृतिक विरासत है, जिसे हर हाल में संरक्षित किया जाना चाहिए।

इस संदर्भ में यह भी उल्लेख किया गया कि जैसे ‘लक्ष्मी भंडार’ योजना के माध्यम से राज्य की माननीय मुख्यमंत्री ममता बनर्जी आर्थिक सशक्तिकरण की दिशा में निरंतर सहयोग दे रही हैं, उसी प्रकार समाज को सरस्वती—अर्थात ज्ञान, भाषा और संस्कृति—की भी उतनी ही आवश्यकता है। इसी सोच के तहत चुनावी मौसम में सरस्वती भंडार की यात्रा की शुरुआत हुई।

संस्था की प्रमुख झरना भट्टाचार्य ने कहा,
“दिन-ब-दिन भाषाई हिंसा बढ़ रही है, जिसके साथ मानसिक आघात, अनुशासनहीनता और उपेक्षा भी बढ़ रही है। हम नहीं चाहते कि यह समय इतिहास में भाषाई हिंसा के युग के रूप में जाना जाए। इसलिए राजनीति और प्रशासन से लेकर समाज और मीडिया तक—सभी को जागरूक और जिम्मेदार होना होगा।”

उन्होंने आगे बताया कि सरस्वती भंडार वर्षों से भाषा के हित में और एक स्वस्थ समाज के निर्माण के लिए निरंतर कार्य कर रही है। वर्ष के अंत से ठीक पहले, 28 दिसंबर की इस संगोष्ठी के माध्यम से संस्था ने अपमानजनक, अश्लील और हानिकारक शब्दों को पीछे छोड़ते हुए, नए वर्ष का स्वागत भाषा संरक्षण और सांस्कृतिक चेतना के संकल्प के साथ किया।

यह आयोजन न केवल भाषा पर एक गंभीर विमर्श बना, बल्कि राजनीति और समाज में भाषाई सम्मान की आवश्यकता को भी मजबूती से रेखांकित कर गया।

राजनीति में भाषा का क्षय?
‘हमें राजनीति में अपनी बंगाली चाहिए’ विषय पर संगोष्ठी आयोजित

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