नि:शब्द प्राणियों के शारीरिक और मानसिक कष्ट को समाज के सामने लाने के उद्देश्य से सरस्वती भांडार द्वारा एक संवेदनशील विचार-विमर्श सभा का आयोजन किया गया, जिसका शीर्षक था “अबोला: जानवरों की अनकही मौन पुकार”। कार्यक्रम का मूल प्रश्न यही था कि यदि हम उनके लिए बोलते हैं, तो क्या हमें थोड़ी-सी मानवीय संवेदना के साथ उनके दर्द को समझने की ज़िम्मेदारी नहीं लेनी चाहिए?
सरस्वती भांडार लंबे समय से नि:शब्द जीवों के अधिकार और गरिमा के लिए कार्य करता आ रहा है। कोलकाता पुस्तक मेले में अनेक बाधाओं के बावजूद एक पालतू कुत्ते के साथ पुस्तक प्रकाशन, बेलगाछिया पशु अस्पताल परिसर में पेट-फ्रेंडली फेयर का आयोजन, तथा सड़क के पशु-पक्षियों के लिए भाईफोंटा और षष्ठी जैसे सामाजिक-सांस्कृतिक कार्यक्रमों के माध्यम से जन-जागरूकता फैलाना—ये सभी उसकी सतत पहल के उदाहरण हैं।
इसी क्रम में 2 फरवरी को अबनिंद्र सभागार में यह चर्चा सभा आयोजित की गई। इसमें वे लोग उपस्थित थे जो निरंतर सड़क के पशु-पक्षियों के कल्याण के लिए कार्य कर रहे हैं और नि:शब्द प्राणियों पर होने वाले अन्याय के विरुद्ध आवाज़ उठाते हैं। प्रमुख वक्ताओं में प्रसिद्ध कवि, साहित्यकार व पत्रकार सैयद हसमत जलाल, गायक शुभायु बनर्जी, महुआ दत्त, तथा श्री रतन झावर सहित कई विशिष्ट व्यक्तित्व शामिल थे।
कार्यक्रम का संचालन सरस्वती भांडार की संस्थापक झरना भट्टाचार्य ने किया। अपने संबोधन में उन्होंने कहा, “सरस्वती भांडार भाषा-हिंसा के विरुद्ध काम करता है और जहाँ भी आत्मा लहूलुहान होती है, वहाँ शब्दों के माध्यम से प्रतिरोध करता आया है और आगे भी करेगा—चाहे पीड़ा सहने वाला सबल हो या अबोला। इंसान होकर थोड़ा-सा मानवीय होना क्या सचमुच नुकसानदेह है?”
उन्होंने समाज की एक विडंबना की ओर भी ध्यान दिलाया। पुस्तक मेलों जैसे बड़े सांस्कृतिक आयोजनों में जहाँ भीड़ और सोशल मीडिया की चमक दिखाई देती है, वहीं कई पालतू जानवर घरों में अकेले डर से काँपते रहते हैं क्योंकि उनके प्रवेश पर रोक होती है। दूसरी ओर, अनेक सड़क के जानवर ध्वनि और वायु प्रदूषण के कारण मानसिक संतुलन खो बैठते हैं। उन्होंने कहा, “जब इतने बड़े आयोजन का केंद्र पुस्तक, शिक्षा और ज्ञान हैं, तो उसकी रोशनी समाज के हर पहलू तक पहुँचे, तभी ऐसे मेले सार्थक होंगे। तभी ज्ञान का सही प्रसार होगा और सोच की संकीर्णता कम होगी।”
यह चर्चा सभा समाज के लिए एक सशक्त संदेश छोड़ गई—सच्ची सभ्यता और शिक्षा वही है जो मौन पीड़ा को भी सुन सके और नि:शब्द प्राणियों के प्रति करुणा दिखा सके।

