भारतीय शास्त्रीय नृत्य की समृद्ध परंपरा को नई पीढ़ी तक पहुंचाने के उद्देश्य से ओडिशी आश्रम का 33वां वार्षिक उत्सव ‘एक ओडिशी संध्या‘ एवं ‘बर्षा मंगलम‘ का भव्य आयोजन ढाकुरिया स्थित मधुसूदन मंच पर किया गया। कार्यक्रम में ओडिशी नृत्य की मनमोहक प्रस्तुतियों ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया।
इस अवसर पर प्रख्यात नृत्य विशेषज्ञ कोहिनूर सेन विराट मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहीं। उन्होंने दिवंगत ओडिशी नृत्य गुरु गिरिधारी नायक को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा कि उनके द्वारा स्थापित ओडिशी आश्रम आज एक विशाल वटवृक्ष का रूप ले चुका है। उन्होंने कहा कि आश्रम के अनेक विद्यार्थी आज देश-विदेश में अपनी विशिष्ट पहचान बना चुके हैं, जो गुरु गिरिधारी नायक की शिक्षा और समर्पण का प्रतिफल है।
कोहिनूर सेन विराट ने यह भी कहा कि गुरु गिरिधारी नायक की पुत्री सुजाता नायक ओडिशी नृत्य के माध्यम से उत्कल की समृद्ध कला एवं संस्कृति को संरक्षित और वैश्विक स्तर पर प्रतिष्ठित करने का सराहनीय कार्य कर रही हैं। उन्होंने पड़ोसी राज्य से इस सांस्कृतिक यात्रा की शुरुआत कर आज इसे अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचाया है।
कार्यक्रम का संचालन ओडिशी आश्रम की कलात्मक निदेशक एवं गुरुमाता तमालिकी नायक ने किया। समारोह में प्रस्तुत ‘एक ओडिशी संध्या‘ और ‘बर्षा मंगलम‘ की कोरियोग्राफी एवं निर्देशन सुजाता नायक द्वारा किया गया, जिसकी दर्शकों ने भरपूर सराहना की।
सांस्कृतिक संध्या में प्रस्तुत ‘तानक‘ नृत्य की आकर्षक वेशभूषा ने विशेष रूप से दर्शकों का ध्यान आकर्षित किया, जबकि ‘आहे नील शैल‘ की एकल (सोलो) प्रस्तुति ने अपनी भावपूर्ण अभिव्यक्ति और उत्कृष्ट नृत्य शैली से उपस्थित दर्शकों को भावविभोर कर दिया।
कार्यक्रम ने एक बार फिर यह सिद्ध कर दिया कि ओडिशी नृत्य केवल एक शास्त्रीय नृत्य शैली नहीं, बल्कि उत्कल की समृद्ध कला, संस्कृति और आध्यात्मिक विरासत का जीवंत प्रतीक है, जिसे ओडिशी आश्रम निरंतर नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने का कार्य कर रहा है।

