बच्चों में होने वाली यूरोलॉजिकल (मूत्र एवं जननांग संबंधी) समस्याओं के सफल उपचार के लिए समय पर विशेषज्ञ चिकित्सक से परामर्श लेना अत्यंत आवश्यक है। यह बात अपोलो चिल्ड्रन्स हॉस्पिटल, चेन्नई के वरिष्ठ बाल यूरोलॉजिस्ट एवं हाइपोस्पेडियोलॉजिस्ट डॉ. जिमी शाद ने कही। उन्होंने बताया कि आज के समय में बच्चों की जटिल यूरोलॉजिकल बीमारियों के उपचार के लिए विशेष रूप से प्रशिक्षित विशेषज्ञ उपलब्ध हैं और शीघ्र निदान से अधिकांश समस्याओं का प्रभावी इलाज संभव है।
डॉ. शाद के अनुसार बच्चों में फिमोसिस (लिंग की तंग अग्रचर्म), इनगुइनल हर्निया, हाइड्रोसील, अवरोहित वृषण (अंडकोष का नीचे न उतरना), हाइपोस्पेडियास, एपिस्पेडियास, ब्लैडर एक्सस्ट्रॉफी, पोस्टीरियर यूरेथ्रल वाल्व (पीयूवी), हाइड्रोनेफ्रोसिस, वेसिकोयूरेटरिक रिफ्लक्स (वीयूआर), किडनी ट्यूमर तथा किडनी स्टोन जैसी समस्याएं देखने को मिलती हैं। इनमें हाइपोस्पेडियास, अवरोहित वृषण और हाइड्रोनेफ्रोसिस सबसे अधिक सामान्य हैं।
उन्होंने बताया कि हाइपोस्पेडियास एक जन्मजात स्थिति है, जिसमें मूत्रमार्ग का छिद्र लिंग के अग्रभाग के बजाय उसके निचले हिस्से में होता है। इसके साथ लिंग का नीचे की ओर झुकाव (कॉर्डी) तथा अग्रचर्म का अधूरा विकास भी हो सकता है। इस समस्या का एकमात्र प्रभावी उपचार शल्य चिकित्सा है। डॉ. शाद के अनुसार, इस स्थिति में माता-पिता को शीघ्र बाल यूरोलॉजिस्ट से परामर्श लेना चाहिए तथा ऑपरेशन के लिए 6 से 9 माह की आयु सबसे उपयुक्त मानी जाती है।
अवरोहित वृषण (Undescended Testis) के संबंध में उन्होंने बताया कि सामान्यतः जन्म से पहले दोनों अंडकोष अंडकोश में उतर जाते हैं। समय से पहले जन्म लेने वाले शिशुओं में यह समस्या अपेक्षाकृत अधिक देखी जाती है। जन्म के बाद लगभग तीन माह तक स्वाभाविक रूप से अंडकोष नीचे आने की संभावना रहती है, लेकिन यदि ऐसा नहीं होता है तो 6 से 9 माह की आयु के बीच शल्य चिकित्सा कराने की सलाह दी जाती है। उपचार में देरी से अंडकोष के विकास, हार्मोनल कार्यक्षमता तथा भविष्य की प्रजनन क्षमता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
डॉ. शाद ने हाइड्रोनेफ्रोसिस के मामलों में भी शीघ्र विशेषज्ञ परामर्श लेने पर जोर दिया। उन्होंने बताया कि यह किडनी एवं रीनल पेल्विस में सूजन की स्थिति होती है, जो अवरोध या अन्य उपचार योग्य कारणों से उत्पन्न होती है। कुछ बच्चों में प्रारंभिक अवस्था में ही शल्य चिकित्सा की आवश्यकता पड़ सकती है।
उन्होंने बताया कि वर्तमान समय में इन अधिकांश बीमारियों का उपचार मिनिमली इनवेसिव तकनीकों जैसे एंडोस्कोपी, लैप्रोस्कोपिक सर्जरी और रोबोटिक सर्जरी के माध्यम से सफलतापूर्वक किया जा रहा है, जिससे बच्चों को कम दर्द, शीघ्र स्वास्थ्य लाभ और बेहतर परिणाम मिलते हैं।
अभिभावकों को सलाह देते हुए डॉ. जिमी शाद ने कहा, “जागरूकता की कमी के कारण कई माता-पिता अपने बच्चों को बहुत देर से लेकर आते हैं। ऐसी किसी भी समस्या के संकेत मिलते ही विशेषज्ञ बाल यूरोलॉजिस्ट से परामर्श लेना चाहिए। समय पर पहचान और उचित उपचार से दीर्घकालिक जटिलताओं से बचा जा सकता है तथा बच्चों का भविष्य अधिक सुरक्षित बनाया जा सकता है।”

